मर्द का मन माँझ

वृषाली सानप काळे
Thursday, 11 July 2019

जैसे भाषा जनानी 
या मर्दानी नही होती।
परिस्थिति की टकसाल में
अनायास ढाली जाती है।

वैसे ही नारी की युगचेतना ने
पुरुषत्व वादी मानसिकता से..
ऊबकर स्त्री संवेदना ने,
की है मांग..
 घृणितता से मुक्ति की..!!

क्योकि हे नर ज़रा सोच..
स्त्री कोई बोन्साई का
 पौधा नही है..
जब तुम चाहो गमलेमें सजा लो।
जब तुम चाहो बाजार में बेच लो।

जैसे भाषा जनानी 
या मर्दानी नही होती।
परिस्थिति की टकसाल में
अनायास ढाली जाती है।

वैसे ही नारी की युगचेतना ने
पुरुषत्व वादी मानसिकता से..
ऊबकर स्त्री संवेदना ने,
की है मांग..
 घृणितता से मुक्ति की..!!

क्योकि हे नर ज़रा सोच..
स्त्री कोई बोन्साई का
 पौधा नही है..
जब तुम चाहो गमलेमें सजा लो।
जब तुम चाहो बाजार में बेच लो।

इस बौनी सामाजिकता
 से  जंग की मुक्ति
सो मुक्ति की सख्ती।
भीख नही मांग नही..
हक अधिकार की सख्ती।

यौनसुख के बदले में
समस्त गुलामी की जंजीरे..
अब बदलनी है तकदीरें..
ये भी सत्य जानू..
इन गलियो,कस्बो,चौबारों में
भेड़िया कौन नही है..!!

पर अब ठान ही लिया है
मर्दों का मन माँझना ही है..!!
समझोते की संस्कृति का विरोध..
करना है बलात्कारी के
बलात्कार का प्रतिरोध...!!
जय जगदम्ब..जय जगदम्ब..!!

 

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