क्युसेकने वाहून नेणारा पुर

डॉ. संदीप एकनाथ क्षीरसागर, सातारा
Sunday, 11 August 2019

स्वप्न अशी की... 
आयुष्याच्या धरणात 
टि. एम. सीन साठवलऽ....!! 
एका क्षणात... 
क्युसेकने वाहून गेलऽ.... '!! 

आता कुठ तरी... 
आयुष्याला सापडला होता सुर 
हा.. मधिच आला हो पूर...!! 

एक सुंदरसऽ... 
घरटऽ होत नदी किनारी 
एक 
सुंदरस घरटऽ होत नदी किनारी... 

असऽ... 
पाणी आलऽ धावून... 
घरटऽ... 
कधी गेलऽ वाहून... 
हे कळलच नाही....!! 

स्वप्न अशी की... 
आयुष्याच्या धरणात 
टि. एम. सीन साठवलऽ....!! 
एका क्षणात... 
क्युसेकने वाहून गेलऽ.... '!! 

आता कुठ तरी... 
आयुष्याला सापडला होता सुर 
हा.. मधिच आला हो पूर...!! 

एक सुंदरसऽ... 
घरटऽ होत नदी किनारी 
एक 
सुंदरस घरटऽ होत नदी किनारी... 

असऽ... 
पाणी आलऽ धावून... 
घरटऽ... 
कधी गेलऽ वाहून... 
हे कळलच नाही....!! 

उभा संसार... 
असा क्षणात ढासळला 
मातीत कधी मिसळला 
हे कळलच नाही.....!! 

आता... 
सतत जाग ;
पोटाची आग ;
उभी धार ;
पाण्याचा मार... 
होता नव्हता तेवढा ;
आयुष्याचा संपला हो सार...!! 

ना श्रीमंत, ना गरीब ;
ना जात, ना पात ;
इथऽ 
कोणीही नाही परका... 
इथऽ 
जीव सगळ्यांचाच एकसारखा....!! 

आता कळाल... 
निर्जीव गोष्टी माघऽ 
आयुष्यभर धरपडलो... 

मित्रा... 
कमवल कित्येक पटीनऽ.. 

याच पुरान... 
शिकवल जगनऽ एकजुटीनऽ...!! 
 

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